गुरुवार, अक्तूबर 08, 2009

दुनिया हिला दी पर .......,




१६ फरबरी १९६२ को आज की भोजपुरी फ़िल्म जगत का सबसे एतिहासिक दिन था, क्योंकि इसी दिन पहली भोजपुरी फ़िल्म गंगा मईया तोहे पियरे चढैबो का मुहूर्त हुआ था पटना के शहीद स्मारक के नीचे। तब से लेकर आज तक भोजपुरी फ़िल्म जगत को अनेक बदलाव से जूझना पड़ा है। कभी कामगारों की फ़िल्म कही जाने वाली भोजपुरी आज न सिर्फ़ नेशनल अवार्ड पा चुकी है बल्कि इसका डंका चारो दिशाओ में बज रहा है । कभी बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के बाज़ार को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली भोजपुरी फ़िल्म आज बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश की सीमा से निकल विदेश की धरती पर भी अपना झंडा गाड़ने में सफल रही है। बात अगर मायानगरी मुंबई की की जाए तो आज बिहार के बाद भोजपुरी फिल्मो का सबसे बड़ा बाज़ार मुंबई ही है। १९८४ में बनी फ़िल्म गंगा किनारे मोरा गाँव से लेकर आज तक मुंबई में भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज ने काफ़ी तरक्की की है। 1963 में बिहार के एक व्यवसाई विश्वनाथ शाहाबादी की फिल्म गंगा मइया तोहें पियरी चढैबो से भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत होती हैं और इस फ़िल्म के प्रेरणा श्रोत थे देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद । हालांकि 20वीं सदी के पांचवें दशक में भोजपुरी क्षेत्र के कई लेखक कवि कलाकार बम्बई फिल्म उद्योग में सक्रिय थे और इन भोज्पुरियो को अपने देश, गांव-जवार की बड़ी याद सताती थी। लेकिन इस भाषा में फ़िल्म बने इसका ख्याल किसी को नही आया। कहा जाता है की विश्नाथ शाहाबादी बड़े बैग में ढेर सारा रुपया लेकर मुंबई आए और दादर में वे प्रीतम होटल में ठहरे जो पुरबियों का अड्‌डा था यहीं उनकी मुलाकात नजीर हुसैन से हुई जो वर्षों से एक पटकथा तैयार करके भोजपुरी फिल्म बनाने की जुगत में थे और इस तरह जनवरी 1961 में नजीर हुसैन के नेतृत्व में गंगा मइया तोहें पियरी चढ़इबो के निर्माण की योजना बनी। फिल्म का निर्देशन बनारस के कुंदन कुमार को सौंपा गया। बनारस के ही रहने वाले कुमकुम और असीम को फिल्म में नायिका और नायक बनाया गया। संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी चित्रगुप्त को दी गई । 1963 में यह फिल्म प्रदर्शित हुई और बेहद सफल हुई। इसके बाद तो इसका सिलसिला ही शुरू हो गया। मुंबई में पहली भोजपुरी फ़िल्म जिस सिनेमाघर में लगी वो थी मिनर्वा और फ़िल्म थी १९८४ में बनी गंगा किनारे मोरा गाँव । आश्चर्यजनक रूप से यह फ़िल्म लगातार चार सप्ताह तक चली और इस तरह मुंबई में भोजपुरी फिल्मो का द्वार खुल गया। इसके बाद लगातार कई फिल्में आई और अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रही, लेकिन भोजपुरी फ़िल्म जगत पर आए संकट के बादल ने मुंबई को भोजपुरी फिल्मो से महरूम कर दिया। लंबे अरसे तक मुंबई में कोई भी भोजपुरी फिल्में रिलीज़ नही हुई। साल २००३ में विश्वनाथ शाहाबादी के भांजे मोहनजी प्रसाद ने हिन्दी फिल्मो में अच्छा ब्रेक पाने की तलाश में भटक रहे जौनपुर के छोरा रविकिशन को लेकर सैयां हमार नाम की एक फ़िल्म बनाकर भोजपुरी फ़िल्म जगत के अब तक के स्वर्णिम युग की शुरुवात की । कुछेक लाख में बनी इस फ़िल्म ने काफी अच्छा व्यवसाई किया। मोहन जी और रवि किशन की इस जोड़ी ने लगातार चार हिट फिल्मे दी। इसी कड़ी को आगे बढाया 2005 में प्रदर्शित फिल्म ससुरा बड़ा पइसा वाला ने । इस फ़िल्म ने भोजपुरी फ़िल्म जगत से जुड़े लोगो को एहसास दिलाया की लोकसंगीत से जुड़े लोग भी अभिनेता बन सकते हैं। उस समय गायकी में मनोज तिवारी मृदुल का डंका बज रहा था, और दर्शको ने ससुरा बड़ा पैसे वाला को हाथो हाथ उठा लिया और मनोज तिवारी रातो-रात लोगो के चहेते बन गए। फ़िर तो बिहार उत्तरप्रदेश के गायकों की भीड़ सी लग गई, लेकिन किस्मत चमकी तो सिर्फ़ दिनेश लाल यादव निरहुआ की। सिर्फ़ पाँच साल पहले तक मात्र ५ हजार के मेहनाता पर गाने वाला निरहुआ अगर आज किसी फ़िल्म के एवज में ३० लाख रूपये मेहनाता लेता है तो इसे भोजपुरी फ़िल्म जगत की ऊंचाई ही कह सकते हैं। आज भले ही मनोज तिवारी फ़िल्म निर्माताओ की पसंद नही हैं लेकिन उन्होंने जो सिलसिला शुरू किया था उसमे कई लोग नाम कम रहे हैं। आज के भोजपुरी के सबसे लोकप्रिय लोक गायक पवन सिंह, गुड्डू रंगीला, छोटू चलिया, सहित दर्जनों ऐसे गायक हैं जो बतौर अभिनेता काम कर रहे हैं। मल्टिप्लेक्स के इस दौर में अगर आज सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर फल फूल रहे हैं तो इसका श्रेय भोजपुरी फिल्मो को ही जाता है । आज हालत ये है की महाराष्ट की इस धरती पर भोजपुरी सिनेमा ने मराठी फिल्मो को भी पीछे छोड़ दिया है । आपको जानकर आश्चर्य होगा की मुंबई में भोजपुरी फिल्मो का बाज़ार मराठी फिल्मो से कई गुना अधिक है। आज मुंबई के लगभग २० सिनेमा घरो में भोजपुरी फिल्मे प्रर्दशित होती है। कई मल्टीप्लेक्स भी अब भोजपुरी फिल्मो का प्रदर्शन कर रहे हैं। मुंबई में बसे भोजपुरी भाषी का यह अपनी भाषा के प्रति प्यार ही है की आज फ़िल्म निर्माता उत्तरप्रदेश की तुलना में मुंबई से कहीं अधिक कमाई कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में रोचक तथ्य यह है की मुंबई में बसे पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोगो की तुलना में बिहार के लोग अधिक संख्या में भोजपुरी फ़िल्म देखते है और धीरे धीरे उत्तरप्रदेश के लोगों का रुझान भी भोजपुरी फ़िल्म को लेकर काफ़ी बढ़ रहा है। यह रुझान भोजपुरी फ़िल्म जगत के लिए एक शुभ संकेत है।

सवाल उठता है इतना विशाल इंडस्ट्रीज बनने के वावजूद आज भी भोजपुरी फ़िल्म जगत को वो सम्मान हासिल क्यों नही हो पाया है जिसकी वो हकदार है ? अगर गहराई से पड़ताल तो मामला साफ़ हो जाता है। आज भोजपुरी जगत स्तरीय फिल्मो से दूर हो गया है, पैसे कमाने की चाहत में फ़िल्म निर्माताओ ने ऐसे वर्ग के दर्शको के लिए फिल्मे बनानी शुरू कर दी है जो अश्लीलता देखना ज्यादा पसंद करते हैं। कई कारपोरेट कंपनिया यहाँ आई लेकिन निर्माताओ और वितरकों की मिलीभगत ने उन्हें कहीं का नही छोड़ा । इसके अलावा आपसी गुटवाजी भी यहाँ बहुत है। पूरी इंडस्ट्रीज अलग अलग गुटों में बँटा है। हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में भी गुटवाजी है, लेकिन इसका असर उनके काम पर नही होता है। यहाँ तो एक दूसरे को नीचा दिखने के चक्कर में लोग अपनी फिल्मो को भी दाव पर लगा देते हैं। इसलिए ये कहा जा सकता है की भोजपुरी फिल्मो ने दुनिया हिला तो दी.....पर औकात छोटी ही रही।
बहरहाल भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज का आज का दौर काफ़ी अच्छा है , लाखो लोग इस इंडस्ट्रीज से अपनी जीविका चला रहे हैं। बरसो पहले जो पौधा लगाया गया था और सालो से मुरझाया था आज विशाल बट वृक्ष बन गया है। गीतेश पाण्डेय


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