भोजपुरी फिल्मो के सदाबहार सुपरस्टार रवि किशन की एंकरिंग का जलवा छोटे परदे पर सर चढ़ कर बोल रहा है, एक तरफ़ उनका शो सुर संग्राम की टीआरपी उनके आने से लगभग दुगुनी हो गई है, वहीँ दूसरी तरफ एनडीटीवी इमेजिन ने उन्हें अपने नए शो की जिम्मेवारी रवि किशन को सौपी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार शो का संभावित नाम राज़ - पिछले जनम का है। इस शो में आने वाले अतिथियों को सम्मोहित कर रवि किशन उनके पिछली जिंदगी के बारे में जानकारी हासिल करेंगे। शो में फ़िल्म और टीवी जगत के सितारों के अलावा हर क्षेत्र के सम्मानित लोगो को बुलाया जाएगा। राज़ - पिछले जनम का का निर्माण डी आईडिया बॉक्स कर रही है जो अमर चित्रकथा की टीवी शो निर्माण कंपनी है। एनडीटीवी इमेजिन और रवि किशन ने इस पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन सूत्रों के अनुसार शो की शूटिंग दिवाली के बाद शुरू होने वाली है, और शो का प्रोमो जल्द ही एनडीटीवी इमेजिन पर शुरू होने वाला है। उल्लेखनीय है की एनडीटीवी इमेजिन के पोपुलर शो राखी का स्वयंवर के तीन एपिसोड में रवि किशन मौजूद थे और तीनो एपिसोड काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। शायद यही वजह थी की चैनल ने रवि किशन को अपने मेगा शो में होस्ट बनाया । यही नही हाल ही में रवि किशन ने महुआ चैनल के शो सुर संग्राम की एंकरिंग शुरू की है, और मजे की बात तो यह है की रवि किशन के पहले एपिसोड की टीआरपी पिछले एपिसोड की तुलना में चार गुना अधिक बढ़ गई है। राज - पिछले जनम के बारे में अच्छी बात ये है की भारतीय टेलीविजन का ये पहला मेगा शो है जो किसी विदेशी शो से प्रेरित नही है।
बुधवार, अक्टूबर 14, 2009
मंगलवार, अक्टूबर 13, 2009
भोजपुरी के पहले खान - जुबेर खान
हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में आमिर, शाहरुख़ और सलमान खान का डंका भले ही बजता हो लेकिन भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज के पास एक भी खान नही है । अब इस कमी को पुरा करने की तैयारी में हैं जुबेर खान, जो प्रसिद्द निर्देशक असलम शेख व निर्मात्री बिज़ल राजदा की खोज हैं। उन्होंने अपनी फ़िल्म राम अवतार में अवतार की भूमिका के लिए चुना है, जबकि राम की भूमिका में हैं भोजपुरी के सदाबहार सुपर स्टार रवि किशन । मुंबई के पले बढे जुबेर खान शायद एक मात्र ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने किशोर नामित कपूर के पास से अभिनय के गुर सिखने के बाद अभिनय की शुरुवात भोजपुरी फिल्मो से ही करने का फ़ैसला किया। आख़िर क्या वजह थी ? पूछने पर जुबेर ने बताया - मेरी माँ बनारस की है, मुंबई में रहने के वावजूद उनके संस्कार बनारस के ही हैं और मुझ पर मेरी माँ की गहरी छाप है इसीलिए मैंने फ़ैसला किया की अभिनय की शुरुवात अपनी माँ की मातृभाषा से ही किया जाए। जुबेर इस बात से इनकार करते हैं की भोजपुरी फ़िल्म करने के बाद उन्हें हिन्दी फिल्मो में मुकाम हासिल नही हो पायेगा । उनका मानना है की अगर आपमें अभिनय क्षमता है तो हर जगह आपकी पूछ होगी। भवन निर्माण के क्षेत्र से जुड़े परिवार का हिस्सा होने के वावजूद जुबेर ने बारहवी पास करने के बाद से ही अभिनय, डांस, सिखने में अपना वक्त देना शुरू कर दिया था। बकौल जुबेर वो फ़िल्म इंडस्ट्रीज में लम्बी पारी खेलने आए हैं और पूर्ण विश्वास है की उनका सपना पूरा होगा।
सोमवार, अक्टूबर 12, 2009
भोजपुरी को आस्कर तक ले जाने की तमन्ना - रवि किशन
बरसो पहले अभिनय की भूख लेकर मुंबई आया जौनपुर का छोरा रवि किशन भोजपुरी फिल्मो का महानायक तो बन गया लेकिन हिन्दी फिल्मो में उन्हें वो मुकाम हासिल नही हो पाया जिसके वो हकदार थे, लेकिन पिछले दो साल से रवि किशन ने बड़े बड़े फ़िल्म मेकर्स की फिल्मो में अच्छी भूमिका अदा कर हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज को यह एहसास करा दिया की इंडस्ट्रीज एक नगीने को बरसो तक उपेक्षा का शिकार बनाती रही । ख़ुद रवि किशन को इस बात का मलाल अवश्य था की अच्छे अभिनय और हीरो की छवि के वावजूद हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में उन्हें वो मुकाम हासिल क्यों नही हुआ। इसी साल रिलीज़ हुई सोहम शाह निर्देशित अष्टविनायक की लक में रवि किशन के अभिनय को काफ़ी सराहा गया। आज रवि किशन सबसे व्यस्त अभिनेताओ की श्रेणी में अग्रीम पंक्ति में हैं। भोजपुरी की सर्वाधिक फ़िल्म आज भी उनके पास है , इसके अलावा हिन्दी की लगभग एक दर्ज़न फ़िल्म और दो टीवी शो में वो एंकर की भूमिका अदा कर रहे हैं। दीपावली के अवसर पर उनसे विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत बातचीत हुई । प्रस्तुत हैं अंश -
दीपावली का अवसर है....इसीलिए पहला सवाल ये है की इससे जुड़ी कोई यादें बताइए ....
जब भी दीपावली का त्यौहार आता है मैं २० साल पुरानी यादो में खो जाता हूँ। बात उन दिनों की है जब मैं पढ़ाई कर रहा था, अपने पॉकेट खर्च निकलने के लिए मैं पार्ट टाइम काम भी करता था, जिसकी जानकारी मेरी माँ को नही थी। दिवाली के अवसर पर मैंने काम से बचाए पैसो ( ७५ रूपये ) से मैंने अपनी माँ के लिए साड़ी खरीदी और दिवाली के दिन उन्हें दिया । माँ ने साड़ी देखते ही बिना कोई सवाल पूछे मुझे जोरदार थप्पड़ मारा, मेरी माँ को लग रहा था की मैंने कोई ग़लत काम कर पैसे कमाए है। लेकिन जब उन्हें सच्चाई पता चली तो वो ख़ुद रो पड़ी।
आपकी आने वाली फिल्मो के बारे में बताइए ?
सबसे पहले मैं अगर हिन्दी फिल्मो की बात करू तो इनं दिनों मणि सर ( मणिरत्नम ) की रावण की शूटिंग अन्तिम चरण में है। इस फ़िल्म में मेरे साथ अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्य राय , गोविंदा और साउथ के सुपर स्टार विक्रम भी केंद्रीय भूमिका में है। इसके अलावा श्याम बाबु ( श्याम बेनेगल) की फ़िल्म वेल डान अब्बा , टी.पी.अग्रवाल की न घर के न घाट के, लूट, मुक्ति, चाय गरम, और एक बड़े बजट की हिंगलिश फ़िल्म भी कर रहा हूँ। जहाँ तक भोजपुरी की बात है तो उदित नारायण जी की फ़िल्म कानून हमरा मुट्ठी में इसी सप्ताह रिलीज़ हो रही है, इसके बाद रंगबाज दरोगा, चंदू की चमेली, जल्द ही प्रर्दशित होगी। फिलहाल बबलू सोनी की सत्यमेव जयते, राज कुमार पांडे की देवरा बड़ा सतावेला और के.डी.की बलिदान की शूटिंग जोर शोर से चल रही है। इसके बाद सुशील उपाध्याय की ज्वालामुखी, किरण कान्त वर्मा की देवदास , धीरज कुमार की राम वनावले जोड़ी, और असलम शेख की राम अवतार की शूटिंग शुरू होगी।
रावण में आपके किरदार की काफ़ी चर्चा हो रही है , क्या भूमिका है आपकी ?
मैं इस बारे में ज्यादा कुछ तो नही बताऊंगा, लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा की इस फ़िल्म में मैं और अभिषेक भाई भाई है। दोनों का अंदाज़ गवई है । मैंने इस फ़िल्म के लिए काफ़ी मेहनत की है। अपने लुक को अपने किरदार के अनुसार ढालने के लिए काफ़ी कुछ करना पड़ा है।
आप टीवी में भी बीजी है, सुना है कोई सेलिब्रिटी शो भी होस्ट कर रहे हैं ?
हाँ फिलहाल तो मैं महुआ चैनल के लोकप्रिय शो सुर संग्राम को होस्ट कर रहा हूँ और जल्द ही एक चैनल के लिए एक शो होस्ट करने वाला हूँ। शो काफ़ी बड़ा है और इसका कांसेप्ट भी बिल्कुल अलग है। इसमे कई बड़े सितारे शामिल हो रहे हैं , जल्द ही इस शो की घोषणा हो जायेगी।
हिन्दी फिल्मो में व्यस्त हैं तो क्या भोजपुरी फिल्में नही करेंगे ?
भोजपुरी फिल्में नही करने का तो सवाल ही नही उठता है। भोजपुरी फिल्मो के कारण ही आज हिन्दी फिल्मो का द्वार मेरे लिए खुला है । वैसे भी भोजपुरी मेरी मातृभाषा है और मुझे भोजपुरी फिल्मो में काम करना पसंद है। जहाँ तक हिन्दी फिल्मो में व्यस्तता की बात है तो मैं भोजपुरी में अपनी फिल्मो की संख्या थोडी कम कर दी है। पहले साल में १२ भोजपुरी फिल्मे करता था ,अब ५-६ फिल्में ही करूँगा।
आप भोजपुरी फिल्मो का भविष्य क्या देखते हैं ?
मेरी इच्छा है की भोजपुरी को मैं ऑस्कर तक ले जाऊ, मैंने भोजपुरी फिल्मो के नेशनल अवार्ड मिलने का सपना देखा था। कब होई गवना हमार ने मेरा ये सपना पूरा कर दिया । आज भोजपुरी में अच्छे अच्छे मेकर और बड़ी बड़ी कंपनिया आ गई है जाहिर है अब वो दिन दूर नही जब भोजपुरी फ़िल्म ऑस्कर में भी धूम मचाएगी।
गुरुवार, अक्टूबर 08, 2009
दुनिया हिला दी पर .......,

१६ फरबरी १९६२ को आज की भोजपुरी फ़िल्म जगत का सबसे एतिहासिक दिन था, क्योंकि इसी दिन पहली भोजपुरी फ़िल्म गंगा मईया तोहे पियरे चढैबो का मुहूर्त हुआ था पटना के शहीद स्मारक के नीचे। तब से लेकर आज तक भोजपुरी फ़िल्म जगत को अनेक बदलाव से जूझना पड़ा है। कभी कामगारों की फ़िल्म कही जाने वाली भोजपुरी आज न सिर्फ़ नेशनल अवार्ड पा चुकी है बल्कि इसका डंका चारो दिशाओ में बज रहा है । कभी बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के बाज़ार को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली भोजपुरी फ़िल्म आज बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश की सीमा से निकल विदेश की धरती पर भी अपना झंडा गाड़ने में सफल रही है। बात अगर मायानगरी मुंबई की की जाए तो आज बिहार के बाद भोजपुरी फिल्मो का सबसे बड़ा बाज़ार मुंबई ही है। १९८४ में बनी फ़िल्म गंगा किनारे मोरा गाँव से लेकर आज तक मुंबई में भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज ने काफ़ी तरक्की की है। 1963 में बिहार के एक व्यवसाई विश्वनाथ शाहाबादी की फिल्म गंगा मइया तोहें पियरी चढैबो से भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत होती हैं और इस फ़िल्म के प्रेरणा श्रोत थे देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद । हालांकि 20वीं सदी के पांचवें दशक में भोजपुरी क्षेत्र के कई लेखक कवि कलाकार बम्बई फिल्म उद्योग में सक्रिय थे और इन भोज्पुरियो को अपने देश, गांव-जवार की बड़ी याद सताती थी। लेकिन इस भाषा में फ़िल्म बने इसका ख्याल किसी को नही आया। कहा जाता है की विश्नाथ शाहाबादी बड़े बैग में ढेर सारा रुपया लेकर मुंबई आए और दादर में वे प्रीतम होटल में ठहरे जो पुरबियों का अड्डा था यहीं उनकी मुलाकात नजीर हुसैन से हुई जो वर्षों से एक पटकथा तैयार करके भोजपुरी फिल्म बनाने की जुगत में थे और इस तरह जनवरी 1961 में नजीर हुसैन के नेतृत्व में गंगा मइया तोहें पियरी चढ़इबो के निर्माण की योजना बनी। फिल्म का निर्देशन बनारस के कुंदन कुमार को सौंपा गया। बनारस के ही रहने वाले कुमकुम और असीम को फिल्म में नायिका और नायक बनाया गया। संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी चित्रगुप्त को दी गई । 1963 में यह फिल्म प्रदर्शित हुई और बेहद सफल हुई। इसके बाद तो इसका सिलसिला ही शुरू हो गया। मुंबई में पहली भोजपुरी फ़िल्म जिस सिनेमाघर में लगी वो थी मिनर्वा और फ़िल्म थी १९८४ में बनी गंगा किनारे मोरा गाँव । आश्चर्यजनक रूप से यह फ़िल्म लगातार चार सप्ताह तक चली और इस तरह मुंबई में भोजपुरी फिल्मो का द्वार खुल गया। इसके बाद लगातार कई फिल्में आई और अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रही, लेकिन भोजपुरी फ़िल्म जगत पर आए संकट के बादल ने मुंबई को भोजपुरी फिल्मो से महरूम कर दिया। लंबे अरसे तक मुंबई में कोई भी भोजपुरी फिल्में रिलीज़ नही हुई। साल २००३ में विश्वनाथ शाहाबादी के भांजे मोहनजी प्रसाद ने हिन्दी फिल्मो में अच्छा ब्रेक पाने की तलाश में भटक रहे जौनपुर के छोरा रविकिशन को लेकर सैयां हमार नाम की एक फ़िल्म बनाकर भोजपुरी फ़िल्म जगत के अब तक के स्वर्णिम युग की शुरुवात की । कुछेक लाख में बनी इस फ़िल्म ने काफी अच्छा व्यवसाई किया। मोहन जी और रवि किशन की इस जोड़ी ने लगातार चार हिट फिल्मे दी। इसी कड़ी को आगे बढाया 2005 में प्रदर्शित फिल्म ससुरा बड़ा पइसा वाला ने । इस फ़िल्म ने भोजपुरी फ़िल्म जगत से जुड़े लोगो को एहसास दिलाया की लोकसंगीत से जुड़े लोग भी अभिनेता बन सकते हैं। उस समय गायकी में मनोज तिवारी मृदुल का डंका बज रहा था, और दर्शको ने ससुरा बड़ा पैसे वाला को हाथो हाथ उठा लिया और मनोज तिवारी रातो-रात लोगो के चहेते बन गए। फ़िर तो बिहार उत्तरप्रदेश के गायकों की भीड़ सी लग गई, लेकिन किस्मत चमकी तो सिर्फ़ दिनेश लाल यादव निरहुआ की। सिर्फ़ पाँच साल पहले तक मात्र ५ हजार के मेहनाता पर गाने वाला निरहुआ अगर आज किसी फ़िल्म के एवज में ३० लाख रूपये मेहनाता लेता है तो इसे भोजपुरी फ़िल्म जगत की ऊंचाई ही कह सकते हैं। आज भले ही मनोज तिवारी फ़िल्म निर्माताओ की पसंद नही हैं लेकिन उन्होंने जो सिलसिला शुरू किया था उसमे कई लोग नाम कम रहे हैं। आज के भोजपुरी के सबसे लोकप्रिय लोक गायक पवन सिंह, गुड्डू रंगीला, छोटू चलिया, सहित दर्जनों ऐसे गायक हैं जो बतौर अभिनेता काम कर रहे हैं। मल्टिप्लेक्स के इस दौर में अगर आज सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर फल फूल रहे हैं तो इसका श्रेय भोजपुरी फिल्मो को ही जाता है । आज हालत ये है की महाराष्ट की इस धरती पर भोजपुरी सिनेमा ने मराठी फिल्मो को भी पीछे छोड़ दिया है । आपको जानकर आश्चर्य होगा की मुंबई में भोजपुरी फिल्मो का बाज़ार मराठी फिल्मो से कई गुना अधिक है। आज मुंबई के लगभग २० सिनेमा घरो में भोजपुरी फिल्मे प्रर्दशित होती है। कई मल्टीप्लेक्स भी अब भोजपुरी फिल्मो का प्रदर्शन कर रहे हैं। मुंबई में बसे भोजपुरी भाषी का यह अपनी भाषा के प्रति प्यार ही है की आज फ़िल्म निर्माता उत्तरप्रदेश की तुलना में मुंबई से कहीं अधिक कमाई कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में रोचक तथ्य यह है की मुंबई में बसे पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोगो की तुलना में बिहार के लोग अधिक संख्या में भोजपुरी फ़िल्म देखते है और धीरे धीरे उत्तरप्रदेश के लोगों का रुझान भी भोजपुरी फ़िल्म को लेकर काफ़ी बढ़ रहा है। यह रुझान भोजपुरी फ़िल्म जगत के लिए एक शुभ संकेत है।
सवाल उठता है इतना विशाल इंडस्ट्रीज बनने के वावजूद आज भी भोजपुरी फ़िल्म जगत को वो सम्मान हासिल क्यों नही हो पाया है जिसकी वो हकदार है ? अगर गहराई से पड़ताल तो मामला साफ़ हो जाता है। आज भोजपुरी जगत स्तरीय फिल्मो से दूर हो गया है, पैसे कमाने की चाहत में फ़िल्म निर्माताओ ने ऐसे वर्ग के दर्शको के लिए फिल्मे बनानी शुरू कर दी है जो अश्लीलता देखना ज्यादा पसंद करते हैं। कई कारपोरेट कंपनिया यहाँ आई लेकिन निर्माताओ और वितरकों की मिलीभगत ने उन्हें कहीं का नही छोड़ा । इसके अलावा आपसी गुटवाजी भी यहाँ बहुत है। पूरी इंडस्ट्रीज अलग अलग गुटों में बँटा है। हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में भी गुटवाजी है, लेकिन इसका असर उनके काम पर नही होता है। यहाँ तो एक दूसरे को नीचा दिखने के चक्कर में लोग अपनी फिल्मो को भी दाव पर लगा देते हैं। इसलिए ये कहा जा सकता है की भोजपुरी फिल्मो ने दुनिया हिला तो दी.....पर औकात छोटी ही रही।
बहरहाल भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज का आज का दौर काफ़ी अच्छा है , लाखो लोग इस इंडस्ट्रीज से अपनी जीविका चला रहे हैं। बरसो पहले जो पौधा लगाया गया था और सालो से मुरझाया था आज विशाल बट वृक्ष बन गया है। गीतेश पाण्डेय
सोमवार, सितंबर 28, 2009
राम अवतार की एतिहासिक शुरुवात
भोजपुरी फिल्मो के सबसे चर्चित निर्देशक असलम शेख अब लेकर आ रहे हैं राम अवतार । भोजपुरी सुपर स्टार रविकिशन अभिनीत इस फ़िल्म से उन्होंने एक नया चेहरा जुबेर खान को भी लॉन्च किया है। दूर्वा प्रोडक्शन के बैनर तले निर्मात्री विजल राजदा की इस फ़िल्म का एतिहासिक मुहूर्त हाल ही में किया गया। अँधेरी के ट्रियो स्टूडियो में इस मौके पर पूरी भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज मौजूद थी। रवि किशन और निर्माता जीतेश दुबे ने नारियल तोड़ कर इसकी विधिवत शुरुवात की । इस अवसर पर अभिनेता दिनेश लाल यादव, ब्रिजेश त्रिपाठी, प्रवेश लाल यादव, निर्माता अभय सिन्हा, चंद्रशेखर राव, मधुसुदन मेहता, निर्देशक राज कुमार पांडे, जगदीश शर्मा, शंकर अरोडा, सोनू त्रिपाठी , अभिनेता समीर राजदा, संगीतकार धनन्जय मिश्रा, आदि उपस्थित थे। उल्लेखनीय है की असलम शेख और रविकिशन की जोड़ी ने इसके पूर्व विदाई जैसी सुपर हिट फ़िल्म दी है। यह फ़िल्म बिहार में पचास सप्ताह के बाद भी धूम मचा रही है। मुहूर्त के अवसर पर रविकिशन ने नए अभिनेता जुबेर खान की तारीफ़ की और कहा की भोजपुरी फ़िल्म जगत को ढेर सारे अच्छे अभिनेता की ज़रूरत है, जुबेर निः संदेह अपने अभिनय से भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में नाम कमाएगा। जुबेर खान ने भी आत्मविश्वास भरे स्वर में भरोसा जताया की वे रवि किशन की बधाई को व्यर्थ जाने नही देंगे।
अपना रास्ता ख़ुद तय करने में भरोसा - सुशील सिंह
भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में अगर अगर अभिनेताओ की बात की जाए तो ऐसे कम ही अभिनेता हैं जिनकी पहचान उनके अभिनय से होती है। सुशील सिंह उन्ही अभिनेताओ में से एक हैं। इ टीवी द्बारा सर्वाधिक लोकप्रिय खलनायक का पुरस्कार पा चुके सुशील सिंह नें खलनायकी को अलविदा कर नायकी के क्षेत्र में कदम रख दिया है। भोजपुरी की अब तक की सबसे चर्चित फ़िल्म मुन्ना बजरंगी के मुन्ना खान का एक नया अंदाज़ अब जल्द ही देखने को मिलेगा फ़िल्म हम हैं मुन्ना भैया में। भोजपुरी फ़िल्म जगत में एक्शन की नई परिभाषा गढ़ने जा रही इस फ़िल्म के एक खतरनाक दृश्य फिल्माए जाने के बाद सुशील सिंह से विस्तृत बातचीत हुई , प्रस्तुत हैं कुछ अंश -
हम हैं मुन्ना भइया के इन खतरनाक दृश्य के लिए आपने डुप्लीकेट का सहारा क्यों नही लिया ?
निर्देशक इकबाल बख्श ने फ़िल्म के सारे दृश्यों पर काफ़ी मेहनत की है और इसके लिए मुझे मानसिक रूप से तैयार भी कराया है। आप देख ही रहे हैं ऐसे एक्शन दृश्य कभी कभार ही देखने को मिलते हैं। जहाँ तक डुप्लीकेट की बात है तो मैं यही कहूँगा - मुझे अपना रास्ता ख़ुद तय करने पर भरोसा है, मेरी पहचान मेरे अभिनय से है , इसलिए रिस्क लेना मैं ज्यादा पसंद करता हूँ।
मुन्ना बजरंगी के मुन्ना खान, कबहू छुटे ना ई साथ वाला भावुक इंसान और हम हैं मुन्ना भइया के टपोरी में से कौन आपके करीब है?
निजी जिन्दगी में मैं कबहू छुटे ना ई साथ वाला इंसान हूँ जो सबके बारे में सोचता है, लेकिन फिल्मी परदे वाला इंसान मेरे किरदार का हिस्सा होता है और उसे जीवंत बनाने के लिए उसमे डूब जाता हूँ। आपने खटाई लाल मिठाई लाल वाला इंसपेक्टर का मेरा किरदार देखा होगा, इसके अलावा जल्द ही एक अन्य फ़िल्म में आप मुझे एक अनोखे अंदाज़ में देखेंगे। उस फ़िल्म में रवि किशन मेरे साथ हैं। जल्द ही फ़िल्म की शूटिंग शुरू हो रही है।
भोजपुरी में पहली बार किसी खलनायक ने नायक का सफर तय किया है..कैसा अनुभव रहा ?
मैं एक अभिनेता हूँ और मेरा मानना है की उसे किसी दायरे में बाँध कर नही रहना चाहिए, बल्कि उसे अभिनय के हर क्षेत्र में पारंगत होना चाहिए, और हर तरह की भूमिका करना चाहिए। भोजपुरी फिल्मो में यह नई बात है लेकिन हिन्दी फिल्मो में शत्रुघ्न सिन्हा और विनोद खन्ना ऐसा कर चुके हैं।
अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और फिल्मो में आगमन के बारे में बताइए ?
मैं मूलतः बनारस का रहने वाला हूँ और संयुक्त परिवार का हिस्सा हूँ। मेरे पिताजी डॉक्टर गुलाब सिंह पेशे से चिकित्सक हैं। अपना होटल और डेयरी का भी व्यवसाय है । जहाँ तक फिल्मो में आगमन की बात है तो मैं इसे संयोगवस ही मानता हूँ। गरमी की छुट्टियों में मुंबई आया था, फिल्मो के प्रति लगाव तो बचपन से ही था और इत्तेफाक से सोनी टीवी के धारावाहिक आहट में मुझे काम मिल गया । मेरी पहली फ़िल्म आंच थी, जो मुझे लेखक कमलेश पांडे के सहयोग से मिली थी। भोजपुरी फिल्मो में आगमन का श्रेय मैं सुशील उपाध्याय को देता हूँ। वे अपनी फ़िल्म कन्यादान के लिए लोकेशन देखने बनारस आए थे, वहीँ उनसे मुलाकात हुई और भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में बतौर खलनायक मेरा आगमन हुआ।
किस तरह की भूमिका करने की चाहत है ?
जिस तरह हिन्दी फिल्मो में अजय देवगन और नाना पाटेकर की छवि है , कुछ वैसी ही भूमिका और छवि की बदौलत भोजपुरी फ़िल्म जगत में अपनी छाप छोड़ना चाहता हूँ।
बुधवार, सितंबर 23, 2009
भोजपुरी का नया सितारा - आशीष
भोजपुरी फ़िल्म जगत में ऐसा कम ही हुआ है जब किसी अभिनेता की पहली ही फ़िल्म काफ़ी सफल हुई हो। बिहार में बड़ी बड़ी और बड़े बड़े सितारों के बीच सफलता का परचम लहरा रही फ़िल्म उमरिया कईली तोहरे नाम के मुख्य अभिनेता आशीष गुप्ता उन्ही में से एक हैं। मूलतः उत्तरप्रदेश के उद्ध्योग नगरी कानपूर के रहने वाले आशीष को बचपन से ही अभिनेता बनने का शौक था, इसीलिए उन्होंने अपने पिता के बिजनेस में हाथ बटाने के वजाय दिल्ली की ओर रुख किया । दिल्ली में मोडलिंग के बाद आशीष मुंबई आए और आर.एस.दुबे प्रोडक्शन के तहत घोषित फ़िल्म उमरिया कईली तोहरे नाम साईंन की । हाल ही में इस फ़िल्म का प्रदर्शन बिहार में हुआ है। इस फ़िल्म में आशीष एक आमिर खानदान के विदेश में पढ़े लिखे होनहार युवक की भूमिका में हैं। उनकी अभिनेत्री रानी चटर्जी है। रानी जैसी नामचीन अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को दर्शको ने काफ़ी सराहा है। उनके उपर फिल्माया गया गाना सान्या मिर्जा कट नथुनिया ......काफ़ी हिट रही है। फिल्मी पंडितो का भी आकलन है की आशीष में जबरदस्त अभिनय क्षमता है, जो आने वाले दिनों में उन्हें भोजपुरी के एक स्थापित अभिनेता की श्रेणी में खड़ा कर देगा। उमरिया कईली तोहरे नाम को अपने सफलता की पहली सीढ़ी मानने वाले आशीष का भी यही मानना है। वो कहते हैं अभिनय ही मेरे जीवन का लक्ष्य है और इसी के लिए ख़ुद को समर्पित कर दिया है।
गुरुवार, सितंबर 10, 2009
रवि को लगा त्रिकोण का चक्कर
भोजपुरी फिल्मो के सदाबहार महानायक रवि किशन इन दिनों तीन अलग अलग कोण का चक्कर लगा कर त्रिकोण के चक्कर में फंस गए हैं। दरअसल रविकिशन इन दिनों तीन अलग अलग तरह की फिल्मो की शूटिंग में व्यस्त हैं, और तीनो फिल्मो की शूटिंग का स्थल दो सौ किलोमीटर की परिधि में है। एक तरफ़ जहाँ वे मणिरत्नम की फ़िल्म रावण की शूटिंग मुंबई से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर मल्शेज घाट की पहाडी पर हैं, तो वहीँ निर्देशक के.डी.की भोजपुरी फ़िल्म बलिदान की शूटिंग पनवेल स्थित सुर्वे फार्म हाउश में चल रही है। इन सबके बीच टी.पी.अग्रवाल की फ़िल्म ना घर के ना घाट के की शूटिंग मुंबई के कमालिस्तान स्टूडियो में चल रही है। रावण में वे जहाँ अभिषेक और ऐश्वर्या के साथ हैं, तो बलिदान में जैकी श्रोफ्फ़ और ना घर के ना घाट के में वे परेश रावल के साथ हैं। बकौल रवि किशन लगातार तीन अलग अलग तरह की फिल्मो की शूटिंग होने से वे त्रिकोण में फंस गए हैं, साथ ही अलग अलग ढंग का किरदार निभाने के कारण उनमे तालमेल बिठाना भी मुश्किल हो जाता है।
शनिवार, अगस्त 22, 2009
सुधाकर पांडे के नाम पर भोजपुरी अवार्ड की घोषणा।

भोजपुरी जगत ने दी सुधाकर पांडे को भावभीनी श्रधांजलि
भोजपुरी फिल्मो के जाने माने निर्माता स्वर्गीय सुधाकर पांडे के नाम पर हर साल अवार्ड दिया जाएगा। ये घोषणा शनिवार को आयोजित एक शोक सभा में भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड समिति के अध्यक्ष विनोद गुप्ता ने की। मुंबई के अँधेरी स्थित आंबेडकर भवन हाल में निर्माता आलोक कुमार और अभय सिन्हा द्वारा सुधाकर पांडे को श्रधांजलि देने के लिए एक शोक सभा का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर टी.पि.अगरवाल, दुर्गा प्रसाद मजुमदार, टी.सीरिज के अजय कपूर, भोजपुरी फिल्मो के सुपर स्टार रवि किशन, कुणाल सिंह, विनोद गुप्ता, निर्देशक राज कुमार पांडे, के.डी, बबलू सोनी , हैरी फ़र्नान्डिस, सुनील बूबना, आनंद गहतराज , मुकेश पांडे अभिनेता ब्रजेश त्रिपाठी, पंकज केसरी, मनोज टाइगर, प्रवेश लाल यादव, अभिनेत्री रिंकू घोष, रानी चटर्जी, सादिका रंधावा गीतकार बिपिन बहार, अरिमर्दन सिंह , प्रचारक उदय भगत , समरजीत, शशिकांत सिंह, निशांत सहित फ़िल्म जगत के जाने-माने लोग मौजूद थे। शोक सभा में कुणाल सिंह ने भोजपुरी फ़िल्म जगत के प्रति सुधाकर पांडे के योगदान की चर्चा करते हुए विनोद गुप्ता से आग्रह किया की उनके सम्मान में एक अवार्ड दिया जाए। विनोद गुप्ता ने तत्काल इसकी हामी भरी और कहा की अगले भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड में भोजपुरी फिल्मो के प्रचार प्रसार में योगदान देने वालो को इस अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। उल्लेखनीय है की पिछले दिनों युवा निर्माता सुधाकर पांडे का आसमयिक निधन हो गया था। स्वर्गीय पांडे को मनोज तिवारी और दिनेश लाल यादव निरहुआ जैसे अभिनेता को फिल्मी परदे पर लाने का श्रेय जाता है, यही नही उनकी पहली फ़िल्म ससुरा बड़ा पैसावाला ने भोजपुरी फ़िल्म जगत के लिए संजीवनी का काम किया था।
रविवार, अगस्त 16, 2009
उमरिया कईली तोहरे नाम २८ अगस्त से

आर.एस.दुबे पिक्चर्स के बैनर तले निर्माता निर्देशक आर.एस.दुबे की फ़िल्म उमरिया कईली तोहरे नाम बिहार में लगभग २५ सिनेमाघरों में आगामी २८ अगस्त को प्रर्दशित हो रही है। रानी चटर्जी, पवन सिंह , दिव्या देसाई, राजेश विवेक , मेहनाज, पुष्पा वर्मा, उत्तम झा, अशोक नारायाण, महेश राज और नवोदित आशीष गुप्ता अभिनीत उमरिया कईली तोहरे नाम का संगीत पहले से ही धूम मचा रहा है। अरुण फ़िल्म इंटरटेनमेंट प्रस्तुत इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत है स्वर कोकिला लता मंगेशकर और संगीतकार राम लक्षमन की जोड़ी का पहली बार किसी भोजपुरी फ़िल्म में साथ साथ आना। फ़िल्म के गीतकार विनय बिहारी हैं, जबकि कथा - पटकथा और संवाद लेखक श्रीगोपाल हैं।फ़िल्म के सभी ११ गाने एक से बढ़कर एक हैं जिन्हें मधुर आवाज से सजाया है ख़ुद लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर, उदित नारायण , सुनिधि चौहान , इंदु सोनाली और आज के भोजपुरी के सर्वाधिक लोकप्रिय गायक पवन सिंह ने। उमरिया कईली तोहरे नाम में दो आइटम नम्बर है जिसपर अपनी मादक अदा बिखेरी है भोजपुरी की नम्बर वन आइटम डांसर सीमा सिंह और कविता सिंह ने। फ़िल्म के निर्माता निर्देशक आर.एस.दुबे के अनुसार उमरिया कईली तोहरे नाम मुख्य रूप से एक मनोरंजक पारिवारिक संगीत प्रधान फ़िल्म है, जिसमे रोमांस , एक्शन , कॉमेडी और इमोशन की भरपूर झलक है जो हर वर्ग के दर्शकों को भरपूर मनोरंजन देगा । साथ ही फ़िल्म में अन्धविश्वास के खिलाफ एक संदेश भी है।बहरहाल उमरिया कईली तोहरे नाम के गानों के दीवानों को आगामी २८ अगस्त का बेसब्री से इंतज़ार है।
शनिवार, अगस्त 15, 2009
दुर्भाग्यपूर्ण है शाहरुख़ के साथ दुर्व्यवहार - रवि किशन
प्रिया सिंह की चाहत कबहू छूटे ना ई साथ

मात्र डेढ़ साल में ही कई भोजपुरी अल्बम , फिल्मो के अलावा प्रिंट विज्ञापन में अपनी खूबसूरती का जलवा बिखेर चुकी प्रिया सिंह जल्द ही नज़र आने वाली है भोजपुरी फ़िल्म कबहू छूटे ना ई साथ में। इस फ़िल्म में प्रिया एक आमिर बाप की इकलौती बेटी की भूमिका में है जो अपने कॉलेज में पढने वाले निजाम खान से प्यार करती है। के.डी.द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में प्रिया के अलावा सुशील सिंह, राजीव दिनकर, स्वीटी छाबरा, स्वाति वर्मा और अनिल यादव मुख्य भूमिका में है। हाल ही में सुरेन्द्र पाल की फ़िल्म ऐ भौजी के सिस्टर में स्वेता तिवारी के साथ और जोगी जी धीरे धीरे में पवन सिंह और सिकंदर खरबंदा के साथ अभिनय का जलवा बिखेर चुकी प्रिया निर्देशक राज कुमार पांडे की फ़िल्म भइया के ससुरारी में भी एक गाने पर ठुमका लगाते दिखने वाली है। मूलतः बनारस की रहने वाली प्रिया की अभिनय की भूख बचपन में स्कूल के दौरान ही पड़ गई थी। बकौल प्रिया - अभिनय और गाने के अलावा उसने और कुछ सोचा भी नही , शायाद इसीलिए मनोज तिवारी के साथ विडियो अल्बम करने के बाद उसने मुंबई की ओर रुख कर लिया । महुआ टीवी के कार्यक्रम बिरहा दंगल में विजय लाल यादव के साथ एंकर की भूमिका निभा चुकी प्रिया फिलहाल कई और फिल्मो के लिए अनुबंधित है। प्रिया का स्पष्ट तौर पर कहना है की फ़िल्म इंडस्ट्रीज से उनका घनिष्ट नाता है और उसका कहना है कबहू छूटे ना ई साथ.
भोजपुरी सिनेमा और मायानगरी मुंबई
१६ फरबरी १९६२ को बिहार की राजधानी पटना के एतिहासिक शहीद स्मारक पर आज के विशाल भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज की नीव रखी गई थी। इस बात को लगभग ५० साल हो गए हैं, कभी बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के बाज़ार को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली भोजपुरी फ़िल्म आज बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश की सीमा से निकल विदेश की धरती पर भी अपना झंडा गाड़ने में सफल रही है। बात अगर मायानगरी मुंबई की की जाए तो आज बिहार के बाद भोजपुरी फिल्मो का सबसे बड़ा बाज़ार मुंबई ही है। १९८४ में बनी फ़िल्म गंगा किनारे मोरा गाँव से लेकर आज तक मुंबई में भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज ने काफ़ी तरक्की की है। सबसे मजे की बात तो ये है की पहली भोजपुरी फ़िल्म की रूपरेखा मुंबई में ही बनी थी और इसके प्रेरणा श्रोत थे देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ।
1963 में प्रदर्शित विश्वनाथ शाहाबादी की फिल्म गंगा मइया तोहें पियरी चढ़इबोसे भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत होती हैं हालांकि 20वीं सदी के पांचवें दशक में भोजपुरी क्षेत्र के कई लेखक कवि कलाकार बम्बई फिल्म उद्योग में सक्रिय थे और इन भोजपुरिहों को अपने देश, गांव-जवार की बड़ी याद सताती थी। बरहज के मोती बीए को हिन्दी फिल्मों में भोजपुरी गीतों के प्रचलन का श्रेय दिया जाना चाहिए इससे हिन्दी भाषी दर्शक भोजपुरी की मिठास से परिचित हुआ।पचास के दशक में भाषाई आधार पर भारत में राज्यों का पुनर्गठन हो रहा था। वास्तव में उसी दौर में हिन्दी फिल्म उद्योग की भी तस्वीर बदल रही थी। सत्यजीत रे ने पाथेर पांचाली बनाकर प्रादेशिक अथवा आंचलिक भाषाओं में सिनेमा बनाने की संभावना और उसकी ताकत दोनों का एहसास करा दिया था। अब हिन्दी फिल्म उद्योग में भी कन्टेंट को लेकर बहस शुरू हुई थी और जिन भाषाओं में सिनेमा नहीं था उन भाषाओं में इस जन कला माध्यम को अपनाये जाने की छटपटाहट इसने पैदा की। 1961 में नितिन बोस के निर्देशन में बनी गंगा-जमुना ने पहली बार अवधी भाषा में संवादों का इस्तेमाल हुआ और भोजपुरी में गीत लिखे गये। फिल्म और उसके गीत सुपरहिट हुए इससे पहली बार यह विश्वास पैदा हुआ कि उत्तर भारतीय बोलियों में भी फिल्म बनायी जा सकती है। इसी साल विश्वनाथ शाहाबादी जो बिहार के एक बड़े व्यवसायी थे और जिन्हें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद ने भोजपुरी में फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया था; वे बम्बई पहुंचे। दादर में वे प्रीतम होटल में ठहरे जो पुरबियों का अड्डा था यहीं उनकी मुलाकात नजीर हुसैन से हुई जो वर्षों से एक पटकथा तैयार करके भोजपुरी फिल्म बनाने की जुगत में थे और इस तरह जनवरी 1961 में नजीर हुसैन के नेतृत्व में गंगा मइया तोहें पियरी चढ़इबो के निर्माण की योजना बनी। फिल्म का निर्देशन बनारस के कुंदन कुमार को सौंपा गया। बनारस के ही रहने वाले कुमकुम और असीम को फिल्म में नायिका और नायक बनाया गया। संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी चित्रगुप्त को दी गई तब बकायदा 16 फरवरी 1962 को पटना के ऐतिहासिक शहीद स्मारक पर फिल्म का मुहुर्त सम्पन्न हुआ।1963 में यह फिल्म प्रदर्शित हुई और बेहद सफल हुई। बनारस में यह फिल्म प्रकाश टाकीज में प्रदर्शित हुई थी और प्रदर्शन के एक सप्ताह के भीतर ही इसकी सूचना आसपास के गांवों में फैल गयी और लोग बैलगाड़ी इक्का और पैदल झुण्ड के झुण्ड सिनेमा देखने पहुंचने लगे। प्रकाश टाकीज के बाहर मेले जैसा दृश्य होता था और कहा जाने लगा-‘गंगा नहा विश्वनाथ जी के दरसन कर, गंगा मइया देखऽ तब घरे जा।'भोजपुरी सिनेमा का इतिहास अगर मुंबई के सन्दर्भ में देखा जाए तो १९८४ में पहली बार मुंबई में बसे भोज्पुरियो को अपनी माटी की खुशबू का अहसास कराती फ़िल्म गंगा किनारे मोरा गाँव का परिचय हुआ और मिनर्वा सिनेमा हॉल इसका गवाह बना । आश्चर्यजनक रूप से यह फ़िल्म लगातार चार सप्ताह तक चली और इस तरह मुंबई में भोजपुरी फिल्मो का द्वार खुल गया। इसके बाद लगातार कई फिल्में आई और अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रही, लेकिन भोजपुरी फ़िल्म जगत पर आए संकट के बादल ने मुंबई को भोजपुरी फिल्मो से महरूम कर दिया। लंबे अरसे तक मुंबई में कोई भी भोजपुरी फिल्में रिलीज़ नही हुई। साल २००३ में विश्वनाथ शाहाबादी के भांजे मोहनजी प्रसाद ने हिन्दी फिल्मो में अच्छा ब्रेक पाने की तलाश में भटक रहे जौनपुर के छोरा रविकिशन को लेकर सैयां हमार नाम की एक फ़िल्म बनाकर भोजपुरी फ़िल्म जगत के अब तक के स्वर्णिम युग की शुरुवात की । कुछेक लाख में बनी इस फ़िल्म ने काफी अच्छा व्यवसाय किया। इसी कड़ी को आगे बढाया 2005 में प्रदर्शित फिल्म ससुरा बड़ा पइसा वाला ने । इसने भोजपुरी सिनेमा के एक तीसरे दौर को जन्म दिया जो पहली बार बाजार की दृष्टि से नई संभावनाओं को जन्म दे रहा था। इसके बाद तो मानो जैसे भोजपुरी फ़िल्म जगत में उफान आ गया । पंडित जी बताई न बियाह कब होई, दरोगा बाबु आई लव यु , बंधन टूटे ना जैसी फिल्मो ने मुंबई में भी जबरदस्त धूम मचाई और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। मल्टिप्लेक्स के इस दौर में अगर आज मुंबई के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर फल फूल रहे हैं तो इसका श्रेय भोजपुरी फिल्मो को ही जाता है । आज हालत ये है की महाराष्ट की इस धरती पर भोजपुरी सिनेमा ने मराठी फिल्मो को भी पीछे छोड़ दिया है । आपको जानकर आश्चर्य होगा की मुंबई में भोजपुरी फिल्मो का बाज़ार मराठी फिल्मो से कई गुना अधिक है। आज मुंबई के लगभग २० सिनेमा घरो में भोजपुरी फिल्मे प्रर्दशित होती है। कई मल्टीप्लेक्स भी अब भोजपुरी फिल्मो का प्रदर्शन कर रहे हैं। मुंबई में बसे भोजपुरी भाषी का यह अपनी भाषा के प्रति प्यार ही है की आज फ़िल्म निर्माता उत्तरप्रदेश की तुलना में मुंबई से कहीं अधिक कमाई कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में रोचक तथ्य यह है की मुंबई में बसे पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोगो की तुलना में बिहार के लोग अधिक संख्या में भोजपुरी फ़िल्म देखते है और धीरे धीरे उत्तरप्रदेश के लोगों का रुझान भी भोजपुरी फ़िल्म को लेकर काफ़ी बढ़ रहा है। यह रुझान भोजपुरी फ़िल्म जगत के लिए एक शुभ संकेत है। भोजपुरी फ़िल्म जगत की चर्चा मुंबई के सन्दर्भ में हो और हर साल होने वाली भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड की चर्चा न हो तो ये मुंबई के साथ ना इंसाफी होगी। पिछले ४ साल से हर साल भव्य तरीके से भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा लगभग साड़ी भोजपुरी फिल्मो का मुहूर्त मुंबई में ही होता है। भोजपुरी के सभी स्टार रविकिशन, मनोज तिवारी मृदुल, दिनेश लाल यादव निरहुआ , विनय आनद, पवन सिंह आदि स्थाई रूप से मुंबई में रहते हैं। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है की भोजपुरी भले ही बिहार उत्तरप्रदेश की भाषा है, लेकिन मुंबई भोजपुरी फ़िल्म जगत का केन्द्र विन्दु है। भोजपुरी फिल्मो के विकास में मायानगरी मुंबई का अहम् योगदान है। भोजपुरी इंडस्ट्रीज का पतन तीन बार हो चुका है, और इसकी वजह थी मुंबई के प्रति निर्माता निर्देशक की बेरूखी। इस बार लगातार पॉँच साल से जिस तरह भोजपुरी फ़िल्म जगत पल्लवित पुष्पित हो रही है उसका कारण इस इंडस्ट्रीज का आधार मुंबई में ही होना है। इस तरह हम कह सकते हैं की बिहार उत्तरप्रदेश अगर खेत है तो मुंबई बीज।
प्रस्तुति - उदय भगत
गुरुवार, अगस्त 13, 2009
सोमवार, अगस्त 10, 2009
जैकी श्रोफ रविकिशन की बलिदान

भोजपुरी फिल्मो के महानायक रवि किशन और हिन्दी फिल्मो के जग्गू दादा यानि जैकी श्रोफ जल्द ही एक साथ दिखेंगे भोजपुरी फ़िल्म बलिदान में। इस फ़िल्म का भव्य मुहूर्त मुंबई के साउंड सिटी स्टूडियो में संपन्न हुआ। निर्माता विश्वनाथ शेट्टी और निर्देशक के.डी.की इस फ़िल्म में अभिनेत्री रिंकू घोष कोरियोग्राफर राजीव दिनकर अनिल यादव और नवोदित अम्बिका मुख्य किरदार में हैं। मुहूर्त का नारियल रवि किशन ने तोडा । गायिका कल्पना ने फ़िल्म का पहला गाना गाकर फ़िल्म का विधिवत रूप से शुभारंभ किया। इस मौके पर भोजपुरी फ़िल्म जगत के तमाम दिग्गज बलिदान की टीम को बधाई देने के लिए मौजूद थे। रविकिशन इस फ़िल्म में दोहरी भूमिका में नज़र आने वाले हैं जबकि राजीव दिनकर रविकिशन के छोटे
भाई की भूमिका में हैं। जैकी श्रोफ की भूमिका क्या है यह रहस्य बरकरार है, वैसे जैकी श्रोफ एक सशक्त भूमिका में हैं और उनका एक अलग अंदाज़ बलिदान में देखने को मिलेगा। फ़िल्म की कथा पटकथा लिखी है मसूद पटेल ने । बकौल रविकिशन फ़िल्म की कहानी काफी दमदार है इसीलिए जब निर्देशक के.डी.ने उन्हें कहानी सुनाई तो तत्काल हाँ कर दी । उल्लेखनीय है की के.डी. ने भोजपुरी फ़िल्म जगत को निरहुआ रिक्शा वाला, श्रीमान ड्राइवर बाबू , मुन्ना बजरंगी, जैसी सुपर हिट फिल्मे दी है। उनकी एक और फ़िल्म कबहू छूटे ना ई साथ भी प्रदर्शन के लिए तैयार है। गुरुवार, जुलाई 30, 2009
बाल बाल बचे अभिषेक और रवि किशन
मणिरत्नम की फ़िल्म रावण की शूटिंग के दौरान एक हाथी के पागल होने से हुए हादसे में अभिषेक बच्चन और भोजपुरिया सुपर स्टार रवि किशन जहाँ बाल बाल बच गए वहीँ हाथी के महाबत को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। हादसे की वजह से मणिरत्नम ने फिल्माए जा रहे दृश्य को बीच में ही रोक कर पूरी यूनिट को उटी भेज दिया और मृतक के परिजनों को पाँच लाख रूपये दिए। मिली जानकारी के अनुसार केरल के त्रिशुर में जंगल के बीच स्थित वाटर फाल के पास अभिषेक बच्चन और रवि किशन का एक दृश्य फिल्माया जा रहा था, इस दौरान ऐश्वर्या राय बच्चन वेनिटी वैन में आराम कर रही थी। इस दृश्य के पहले वाले दृश्य के लिए मणिरत्नम ने वहां कई हाथियों का इंतजाम किया था। दृश्य पूरा होने के कारण महावत हाथी को वापस ले जा रहा था। उसी दौरान अचानक हाथी ने महाबत को अपने सूँड से उठा लिया और इधर उधर भागने लगा। इसके कारण सेट पर भगदड मच गई । अभिषेक और रवि किशन भी वहां से किसी तरह निकल गए। इस बीच पागल हाथी ने अपने महावत को जमीं पर पटक कर उसकी हत्या कर दी। इस हादसे की वजह से मणिरत्नम ने तत्काल शूटिंग रुकवा दी और यूनिट को उटी रवाना कर दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार अभिषेक और रविकिशन ने उस हाथी के साथ कुछ घंटे पहले ही शूटिंग की थी, अगर उस दौरान हाथी पागल होता तो कुछ भी हो सकता था।
बुधवार, जुलाई 29, 2009
भोजपुरिया भइया करेंगे मराठी मुलगी का कन्या दान
रविवार, जुलाई 26, 2009
रोल देने के बहाने प्रड्यूसर ने किया फिल्म ऐक्ट्रिस से रेप
गुरुवार, जुलाई 23, 2009
दिलीप कुमार, शाहरुख़ के बाद अब रविकिशन बने देवदास
भोजपुरिया महानायक रवि किशन के सितारे इन दिनों बुलंदी पर हैं। एक तरफ़ मेगा स्टारर हिन्दी फ़िल्म लक में उनके अभिनय का डंका बज रहा है, वहीँ दूसरी तरफ भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में भी वे एक नया इतिहास रचने जा रहे हैं। जी हाँ प्रसिद्द उपन्यासकार शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित फ़िल्म देवदास में वे देवदास की भूमिका निभाने जा रहे हैं। प्रसिद्द लेखक शरत चंद्र के चर्चित उपन्यास देवदास पर अभी तक कुल तीन फिल्मे हिन्दी में बन चुकी है । पहली फ़िल्म में के.एल.सहगल दूसरी में दिलीप कुमार और तीसरी फ़िल्म में शाहरुख़ खान ने नाकाम प्रेमी देवदास की भूमिका निभाई थी। अब एक बार फिर देवदास बनने जा रहा है, लेकिन ये देवदास हिन्दी में नही बल्कि भोजपुरी में होगा और इसमे मुख्य भूमिका यानी देवदास की भूमिका में होंगे भोजपुरी के महानायक रवि किशन । लगभग ४० हिन्दी और सौ भोजपुरी फ़िल्म कर चुके रविकिशन को भोजपुरी का सदाबहार अभिनेता माना जाता है। भोजपुरी के अन्य अभिनेताओ से उमर में बड़े रविकिशन की खासियत है की वो आज भी उनसे छोटे दीखते हैं, चाहे रोमांटिक भूमिका हो या एक्शन आज भी उनका कोई जोड़ नही है। भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज के उतार चडाव का भी उनपर कोई असर नही पड़ा है । यही वजह है की उनके खाते में आज भी अन्य व्यस्त अभिनेताओ की तुलना में दुगुनी फिल्मे हैं। ख़ुद सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से भोजपुरी के महानायक का खिताब पा चुके रविकिशन की बहुचर्चित हिन्दी फ़िल्म लक का विशेष शो हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज के तमाम दिगज्जो ने देखा और सबने रवि किशन के अभिनय की सराहना की यहाँ तक की साउथ के दिग्गज स्टार कमल हसन ने तो रवि किशन को फ़ोन कर उन्हें बधाई दी और कहा की हमलोग जल्द ही साथ में काम कर रहे हैं।उल्लेखनीय है की रविकिशन इन दिनों हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज के बड़े बड़े दिग्गजों की फिल्मो में काम कर रहे हैं। जहाँ तक भोजपुरी की बात है उन्होंने बताया की किसी भी हाल में वो भोजपुरी फ़िल्म करना बंद नही करेंगे। यही नही पिछले एक सप्ताह में उन्होंने ५ नई भोजपुरी फिल्मे साइन की है । इन फिल्मो में एक फ़िल्म देवदास भी है जिसका निर्माण सिग्मा सिनेविजन के बैनर तले निर्माता उमेश सिंह व निर्देशक किरण कान्त वर्मा कर रहे हैं। उमेश सिंह के अनुसार जब भोजपुरी में देवदास बनाने की बात चली तो देवदास की भूमिका के लिए पूरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में हमें
जब अदालत से हुआ स्वाति वर्मा का अपहरण
भोजपुरी फिल्मो की तरीका स्वाति वर्मा और उसके बेटे का पिछले दिनों भीड़ भाड़ वाले एक अदालत से समर सिंह के गुंडों ने अपहरण कर लिया वो भी उनके पति सुशील सिंह , देवर राजीव दिनकर, व निजाम खान की मौजूदगी में। आप सोच रहे होंगे की इतनी हॉट न्यूज़ पर कुछ चर्चा क्यूँ नही हो रहा है, दरअसल सारा मामला फिल्मी है। पिछले दिनों स्टार मेकर निर्देशक के.डी.उर्फ दिनकर कपूर की फ़िल्म कबहू छूटे न ई साथ की शूटिंग मुंबई के बसरा स्टूडियो में चल रही थी। निर्माता निजाम खान और निर्देशक के.डी.के बुलावे पर पत्रकारों की टीम वहां पहुँची तो के.डी.वहां बने अदालत के कमरे में टी.वी.मोनिटर पर बैठकर दृश्य का अवलोकन कर रहे थे। सुशिल सिंह वकील की पोशाक में थे तो राजीव दिनकर मुजरिम के कठघरे में खड़े थे। सामने दर्शक द्रुघा में राजीव की माशूका स्वीटी, स्वाति वर्मा, निजाम खान, प्रिया सिंह , प्रकाश जैस , खुशी , और समरसिंह ( अनिल यादव) अपने गुर्गो के साथ थे। के.डी.के एक्शन कहते ही सुशील सिंह और एक अन्य वकील में जोरदार बहस शुरू हुई और जब सुशिल सिंह का पलडा भरी पर्ने लगा तब समर सिंह के इशारे पर उसके गुंडों ने भरी अदालत में स्वाति वर्मा का अपहरण कर लिया। के.डी.के कट कहते ही हम उनसे इस दृश्य के बारे में विचार विमर्श करने लगे । के.डी.ने बताया की कबहू छूटे न ई साथ तीन भाइयो की कहानी है। परिस्थिति ऐसी बनती है की दोनों छोटे भाई राजीव और निजाम अपने बड़े भाई सुशील सिंह से बिचड जाते हैं। सुशील सिंह नामी वकील हैं वहीँ राजीव ऑटो रिक्शा चलाकर अपना गुजरा करता है, जबकि निजाम खान पढ़ाई करता है। यहाँ जो दृश्य चल रहा है वो एक हत्या के मामले का है। राजीव को हत्या के झूठे मामले में फंसा दिया जाता है और सुशील सिंह इसका वचाव करते हैं। के.डी.ने आगे बताया की फ़िल्म की शूटिंग लगभग पूरी होगई है और सितम्बर में ये फ़िल्म दर्शको के समक्ष होगी। श्री साईं सिने विजन ( सुमीत वर्मा ) इस फ़िल्म के प्रस्तुतकर्ता हैं जबकि इसका निर्माण सबा आर्ट इंटरनेशनल ने किया है। इस फ़िल्म से प्रसिद्द कोरियोग्राफेर राजीव दिनकर अपने अभिनय की पारी की शुरुवात कर रहे हैं।
सोमवार, जुलाई 20, 2009
एक खबरिया चैनल के पत्रकार की व्यथा

आज के दौर में खबरिया चैनल किस कदर टी.आर.पी.के कारण कुछ भी करने को तैयार है उसका एक नमूना आपके सामने है। एक चैनल से जुड़े पत्रकार की व्यथा हम आपके सामने रख रहे हैं- उस पत्रकार की बात मैं शब्द्श : आपके सामने रख रहा हूँ।इस लेख को पढ़ने के पहले मेरा परिचय जान लीजिए मैं एक इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चैनल से जुड़ा हूँ, जुड़ा क्या हूँ, अपनी भावनाएँ और संवेदनाओं को ताक पर रखकर अपना पेट पाल रहा हूँ। एक पत्रकार और एक रिपोर्टर के तौर पर काम करते समय मैं कई बार ऐसी परिस्तिथियों से गुजरा हूँ जब मन ने तो उस खबर को करने के लिए न कह दिया लेकिन मजबूरन मुझे वो खबर करनी पड़ी। क्या करूँ आखिर सवाल टीआरपी का है। पिछले दिनों ऐसी ही एक खबर से रूबरू होने का मौका मिला और उस वक्त इलैक्ट्रानिक मीडिया की प्रतिस्पर्धा देखकर पर ही शर्म आने लगी, लेकिन फिर भी दिल में कसक रही कि अगर इस बार भी कुछ नहीं लिखा तो मैं अपने आपके साथ ही न्याय नहीं कर पाउंगा। आपको भेज रहा हूं क्यूंकि आप शायद मेरी भावनाओं को समझेंगे। ये हकीकत भी है और कई बार एक पत्रकार की परेशानी भी। यह मेरे अकेले का किस्सा नहीं है, यह देश भर के हर उस पत्रकार की कहानी है, जो किसी न किसी न्यूज़ चैनल से जुड़ा है। अंग्रेजी कम समझने वाले लोग गल्ती से कई बार न्यूज़ चैनलों को न्यूड चैनल भी बोल देते हैं, मगर अनजाने में भी वे कितनी सटीक बात कह देते हैं, इसका अहसास तो न्यूज़ चैनल से जुड़े हम लोगों को हर पल, हर साँस के साथ होता है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश के रायसेन जिले से एक खबर आई। एक पत्रकार होने के नाते मेरे लिए उस खबर पर अचंभित होना लाज़मी था। खबर थी कि एक मुर्गी ने इंसान के बच्चे को जन्म दिया। लगभग एक हाथ की लंबाई का वो बच्चा जन्म लेते ही मर गया। पता नहीं क्यूँ मेरा मन ये मानने से इंकार कर रहा था कि ऐसा हो सकता है, क्यूँकि विज्ञान का विद्यार्थी रह चुके होने के नाते मुझे डार्विन का सिद्वांत याद आ रहा था कि शुरूआती तीन महीनों में इंसान और जानवर दोनों का विकास एक जैसा होता है। पर खबर थी तो करना भी जरूरी था। मुझे लगा हो सकता है कि कोई उस भ्रूण को वहाँ पर फेंक गया हो या फिर डार्विन भाई का सिद्वांत ही ठीक हो। खबर करने का मन न होने का एक कारण यह भी था कि उस बच्चे को पैदा होते किसी ने नहीं देखा। लेकिन उपर से आदेश था तो खबर करना भी जरूरी था लेकिन क्या करें दिल है कि मानता ही नहीं। पाँच बजे तक हमने इंतजार किया और जब देखा कि सभी चैनलों ने उसे चलाना शुरू कर दिया तो मजबूरन मुझे भी ये खबर करनी पड़ी। हालांकि अगले दिन वित्त मंत्री देश का बजट लोकसभा के पटल पर रखने वाले थे लेकिन बजट को पीछे छोड़कर मुर्गी बाजी मार ले गई। खबर करते वक्त मैंने अपने एक वरिष्ठ साथी जो राष्ट्रीय चैनल के संवाददाता है उनसे जब बजट छोड़कर इस खबर को करने के बारे में पूछा तो उनका जवाब मेरे इस लेख का शीर्षक बन गया। उन्होंने साफ लहज़े में कहा ‘‘सनसनी है बेटा... टीआरपी बढ़ेगी‘‘ निशचित ही मीडिया का विस्तार सभी ओर तेजी से हो रहा है। अखबारों की संख्या और उनकी प्रसार संख्या में बहुमुखी बढ़ोत्तरी हुई है। रेडियों स्टेशनों की संख्या और उनके प्रभाव-क्षेत्रों के फैलाव के साथ-साथ एफ़एम रेडियो एवं अन्य प्रसारण फल-फूल रहे हैं। स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय चैनलों की संख्या भी बहुत बढ़ी है। यह सूचना क्रांति और संचार क्रांति का युग है, इसलिए विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ इनका फैलाव भी स्वाभाविक है। क्योंकि जन-जन में नया जानने की उत्सुकता और और जागरूकता बढ़ी है। यह सब अच्छी बात है, लेकिन चौंकाने वाली और सर्वाधिक चिंता की बात यह है कि टीवी चैनलों में आपसी प्रतिस्पर्धा अब एक खतरनाक मोड़ ले रही है। अपने अस्तित्व के लिए और अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाने के लिए चैनल खबरें गढ़ने और खबरों के उत्पादन में ही लगे हैं। अब यह प्रतिस्पर्धा और जोश एवं दूसरों को पछाड़ाने की मनोवृत्ति घृणित रूप लेने लगी है। अब टीवी चैनल के कुछ संवाददाता दूर की कौड़ी मारने और अनोखी खबर जुटाने की उतावली में लोगों को आत्महत्या करने तक के लिए उकसाने लगे हैं। आत्महत्या के लिउ उकसाकर कैमरा लेकर घटनास्थल पर पहुँचने और उस दृश्य को चैनल पर दिखाने की जल्दबाजी तो पत्रकारिता नहीं है। इससे तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जायेगी। पर क्या करें बात तो सनसनी और टीआरपी की है। खबरों का उत्पादन अगर पत्रकार करें तो यह दौड़ कहाँ पहुँचेगी ? सनसनीखेज खबरों के उत्पादन की यह प्रवृत्ति आजकल कुछ अति उत्साहित और शीघ्र चमकने की महत्वाकांक्षा वाले पत्रकारों में पैदा हुई है। प्रतिस्पर्धा करने के जोश में वे परिणामों की चिंता नहीं करते। ऐसे गुमराह पत्रकार कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। पूरे परिवार को आत्महत्या के लिए उकसाना या रेहड़ीवालों को जहर खाने की सलाह देना अथवा भावुकता एवं निराशा के शिकार किसी व्यक्ति को बहुमंजिला इमारत से छलांग लगाने के लिए कहना और ऐसे ह्रदय-विदारक हादसे दर्शाने के लिए कैमरा लेकर तैयार रहना स्वस्थ पत्रकारिता और इंसानियत के खिलाफ़ है। इसी तरह स्टिंग आपरेशन के प्रयोग भी होते हैं। निश्चित ही स्टिंग ऑप्रेशन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया द्वारा स्वीकृत पत्रकारिता है। लेकिन मुद्दा ये है कि वह किस मकसद से हो रही है। स्टिंग ऑप्रेशन गलत चीजों के प्रति लोगों को आगाह करता है। ऐसे में चंद स्वार्थ प्रेरित आपरेशन न सिर्फ स्टिंग आपरेशन के मकसद, बल्कि उसकी महत्ता को ही खत्म कर देंगे। सबसे बड़ी बात कि सरकार को इसकी आड़ में इलैक्ट्रानिक चैनलों की आवाज दबाने का मौका मिल जाएगा। यह जिम्मेदारी चैनल की ही बनती है कि वह स्टिंग आपरेशन की पवित्रता और मकसद से भटके नहीं। टीआरपी की दौड़ में अपनी विशवसनीयता नहीं खोए। ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर भी एक खेल सा चल रहा है। मैं व्यक्तिगत स्तर पर इस बारे में यही कहना चाहूंगा कि चैनल को गंभीरता के साथ सोचना होगा और फिर दिखाना होगा कि ब्रेकिंग न्यूज वास्तव में है क्या। इन दिनों कुछ खबरिया चैनल मिथक कथाओं को ऐसे पेश करते नजर आते हैं जैसे वे सच हों। वे उसे आस्था और विशवास का मामला बनाकर पेश करते हैं। खबर को आस्था बना ड़ालना प्रस्तुति का वही सनसनीवादी तरीका है। सच को मिथक और मिथक को सच में मिक्स करने के आदी मीडिया को विजुअल की सुविधा है। दृश्य को वे संरचना न कहकर सच कहने के आदी हैं। यही जनता को बताया जाता है कि जो दिखता है वही सच है। सच के निर्माण की ऐसी सरल प्रविधियाँ पापुलर कल्चर की प्रचलित परिचित थियोरीज के सीमांत तक जाती हैं जिनमें सच बनते-बनते मिथक बन जाता है। मिथक को सच बनाने की एक कला अब बन चली है। अक्सर दृश्य दिखाते हुए कहा जाता है कि यह ऐसा है , वैसा है। हमने जाके देखा है। आपको दिखा रहे हैं। प्रस्तुति देने वाला उसमें अपनी कमेंट्री का छोंक लगाता चलता है कि अब हम आगे आपको दिखाने जा रहे हैं... पूरे आत्मविश्वास से एक मीडिया आर्कियोलॉजी गढ़ी जाती है, जिसका परिचित आर्कियोलॉजी अनुशासन से कुछ लेना-देना नहीं है। इस बार मिथक निर्माण का यह काम प्रिंट में कम हुआ है, इलैक्ट्रानिक मीडिया में ज्यादा हुआ है। प्रस्तुति ऐसी बना दी जा रही है कि जो कुछ पब्लिक देखे उसके होने को सच माने। जबसे चैनल स्पर्धात्मक जगत में आए हैं तबसे मीडिया के खबर निर्माण का काम कवरेज में बदल गया है। चैनलों में, अखबारों में स्पर्धा में आगे रहने की होड़ और अपने मुहावरे को जोरदार बोली से बेचने की होड़ रहती है। ऐसे में मीडिया प्रायः ऐसी घटना ही ज्यादा चुनता है जिनमें एक्शन होता है। विजुअल मीडिया और अखबारों ने खबर देने की अपनी शैली को ज्यादा भड़कीला और सनसनीखेज बनाया है। उनकी भाषा मजमे की भाषा बनी है ताकि वे ध्यान खींच सकें। हर वक्त दर्शकों को खींचने की कवायद ने खबरों की प्रस्तुति पर सबसे ज्यादा असर डाला है। प्रस्तुति असल बन गई है। खबर चार शब्दों की होती है, प्रस्तुति आधे घंटे की, दिनभर की भी हो सकती है लोकतांत्रिक समाज में मीडिया वास्तव में एक सकारात्मक मंच होता है जहाँ सबकी आवाजें सुनी जाती हैं। ऐसे में मीडिया का भी कर्तव्य बन जाता है वह माध्यम का काम मुस्तैदी से करे। खबरों को खबर ही रहने दे , उस मत-ग्रस्त या रायपूर्ण न बनाये। ध्यान रखना होगा कि समाचार उद्योग, उद्योग जरूर है लेकिन सिर्फ उद्योग ही नहीं है। खबरें प्रोडक्ट हो सकती हैं, पर वे सिर्फ प्रोडक्ट ही नहीं हैं और पाठक या दर्शक खबरों का सिर्फ ग्राहक भर नहीं है। कुहासे में भटकती न्यूज़ वैल्यू का मार्ग प्रशस्त करके और उसके साथ न्याय करके ही वह सब किया जा सकता है जो भारत जैसे विकासशील देश में मीडिया द्वारा सकारात्मक रूप से अपेक्षित है। तब भारत शायद साक्षरता की बाकायदा फलदायी यात्रा करने में कामयाब हो जाए और साक्षरता की सीढ़ी कूदकर छलांग लगाने की उसे जरूरत ही न पड़े। लेकिन पहले न्यूज वैल्यू के सामने खड़े गहरे सनसनीखेज खबरों के धुंधलके को चीरने की पहल तो हो।
शनिवार, जुलाई 18, 2009
ऐसे मत करो अपमान भोजपुरी का

आज भोजपुरी इतना विशाल वट वृक्ष बन गया है जिसकी छाव तले करोडो लोग अपना पेट पाल रहे हैं, इनमे से कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिन्हें महान बनाया भोजपुरी ने । मैं यहाँ भोजपुरी फ़िल्म जगत से जुड़े लोगो की बात कर रहा हूँ। आज हमारे फ़िल्म इंडस्ट्रीज में कई दिग्गज हैं जिन्हें भोजपुरी के आलावा कोई घास भी नही डालता है। मैं किसी का नाम लेकर उन्हें आइना नही दिखाना चाहता , लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा की अगर आप खाते हो भोजपुरी से और आपकी मातृभाषा भी भोजपुरी है और आप भोजपुरी फ़िल्म और अल्बम रिलीज़ कर रहे हैं तो दो शब्द भोजपुरी में तो होना ही चाहिए। दरअसल पिछले दिनों एम सीरिज नाम से एक नई म्यूजिक कंपनी की शुरुवात हुई। समारोह में बड़े - बड़े पोस्टर लगे थे पोस्टर की भाषा अंगरेजी में थी वहां सिर्फ़ एक छोटा लाइन लिखा था ३० करोड़ भाषा भाषी लोगन के पहचान । इसके आलावा ऐसा कुछ भी न दिखा जिसे देखकर ये कहा जा सके की ये कार्यक्रम भोजपुरी का है। मनोज तिवारी ने इस मौके पर लंबा चौडा भाषण दिया लेकिन वे भी भूल गए की भोजपुरी में कुछ बोला जाए हाँ उन्होंने गाना ज़रूर भोजपुरी में गया शायद इसीलिए की उनका अल्बम भोजपुरी में था। भला हो मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह का जिन्होंने भोजपुरी में दो शब्द कहे । कितना अच्छा होता जब जब भोजपुरी फ़िल्म जगत के हमारे सारे पुरोधा ऐसे कार्यक्रमों में भोजपुरी में बात करें। आप सोच रहे होंगे की मैं भोजपुरी की वकालत तो कर रहा हूँ, लेकिन हिन्दी में क्यूँ लिख रहा हूँ। दरअसल मुझे भोजपुरी नही आती , चुकी इस इंडस्ट्रीज का एक हिस्सा हूँ, इसीलिए इस कड़वी सच्चाई को बयां कर रहा हूँ। वैसे मैं इस इंडस्ट्रीज में कुछ लोगो के लिए विवादित रहा हूँ, लेकिन मुझे नही लगता की सच्चाई बयां करने में हिचकिचाना चाहिए।
बिरहा सम्राट विजय लाल का जलवा

बिरहा गायकी में अपना सिक्का जमा चुके विजय लाल यादव का जलवा इन दिनों मुंबई के उन सिनेमाघरों में छाया हुआ है जहाँ उनकी फ़िल्म बियाह द फूल इंटरटेनमेंट चल रही है। उल्लेखनीय है की विजय लाल की फ़िल्म इसी शुक्रवार को मुंबई में रिलीज़ हुई है। फ़िल्म के प्रचार के लिए विजय लाल सिनेमाघरों में जाकर अपने प्रशंशको का मनोरंजन कर रहे हैं। इस काम में फ़िल्म की हिरोइन लवी रोहतगी और गायक सोनू सिंह सुरीला भी उनका साथ दे रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में अच्छा कारोबार कर चुकी इस फ़िल्म का निर्माण माडर्न म्यूजिक कंपनी के बैनर तले निर्माता अरिमर्दन सिंह व निर्देशक विजेंद्र आकांक्षा ने किया है। बियाह द फूल इंटरटेनमेंट गाँव में शादी वियाह में अड़ंगा लगाने वालो की कहानी पर आधारित है। फ़िल्म के अन्य कलाकारों में प्रसिद्द गीतकार बिपिन बहार , लोकगायक आनंद मोहन, दिवाकर द्वेवेदी आदि हैं। फ़िल्म में लोक गायकों की भरमार है। दिवाकर द्वेवेदी उत्तर प्रदेश के प्रसिद्द लोक गायक माने जाते हैं। ढेर सारे गायकों को फ़िल्म में शामिल करने के सम्बन्ध में अरिमर्दन सिंह का कहना है की हर गायकों का अपना एक श्रोता वर्ग है, और बिहार यु।पी।में फ़िल्म हिट कराने में इन गायकों का भी अपना एक अहम् योगदान है।
बुधवार, जुलाई 15, 2009
भोजपुरी का पहला सोशल नेटवर्क वेबसाइट शुरु

भोजपुरी भाषियों के लिये दुनिया की सबसे बडी वेबसाइट भोजपुरिया डॉट कॉम ने कल यहाँ एक नई वेबसाइट का शुभारम्भ किया, जोकि एक सोशल नेटवर्क के रुप में है। इस वेबसाइट पर लोग अपने गाँव-जवार के लोगों को खोज कर उनसे सीधा संपर्क बना सकते हैं।इस वेबसाइट पर कोई भी रेजिस्टर कर के वहाँ अपने आस-पडोस की खबरों को शेयर कर सकता है, साथ- ही- साथ विभिन्न विषयों व मुद्दों पर विचार-विमर्श भी कर सकता है। इस सब के अलावा यह वेबसाइट लोगों को अपना खुद का ब्लॉग बनाने का भी स्थान देती है। "भोजपुरिया डॉट कॉम तो पहले से ही भोजपुरी-भाषियों का सबसे बडा पोर्टल है, पर हम बहुत दिन से एक वेबसाइट के बारे में सोच रहे थे, जहाँ लोग आपस में बातचीत कर सकें. इसके अलावा वो अपने आस-पास की गतिविधियों से संबंधित विडियो भी उस पर अपलोड कर सकें," भोजपुरिया डॉट कॉम के निदेशक सुधीर कुमार ने कहा. "आप इसे भोजपुरिया डॉट कॉम का दूसरा संस्करण कह सकते हैं। हमें पुरा विश्वास है कि इस के जरिए लोग एक दूसरे से आसानी से जुड पाएंगे। भोजपुरी भाषा व संस्कृति के विकास में यह वेबसाइट एक मील का पत्थर साबित होगी", सुधीर ने आगे बताया। प्रसिद्ध वेबसाइट आर्कुट की तरह काम करने वाली इस वेबसाइट को आम लोगों का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है, और बडी संख्या में भोजपुरी भाषी इस वेबसाइट से जुड रहे हैं। ज्ञात हो कि इस से पहले भोजपुरिया डॉट कॉम को देश-विदेश में कई अवार्ड व सम्मान मिल चुके हैं।
भोजपुरी की नई आयटम गर्ल

भोजपुरी की नई आयटम गर्ल भोजपुरी फिल्मो में अगर आयटम डांस न हो तो भोजपुरिया दर्शको को मजा नही अत है। या यूँ कहे की आयटम डांस और आज की भोजपुरी फ़िल्म एक दूसरे का पर्याय बन चुके हैं तो कोई ग़लत नही होगी और यही वजह है की इस फ़िल्म जगत में आयटम डांसरों की काफ़ी डिमांड है। लगभग दो दर्ज़न आयटम डांसरों के बीच एक नई आयटम गर्ल अपनी जगह बनाने में सफल रही है। रीना सिंह नाम की इस आयटम डांसर को भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज की नई सनसनी के नाम से जाना जा रहा है। रीना ने हाल ही में अपनी बड़ी बहन और भोजपुरी की सर्वश्रेष्ट आयटम गर्ल सीमा सिंह से प्रेरणा लेकर शुरुवात की है। प्रेम पुजारन और दूल्हा फूंके चूल्हा अभी रिलीज़ तो नही हुई है,लेकिन रीना की चर्चा आज सबकी जुबान पर है। ख़ुद रीना का सपना भी सर्वश्रेष्ट आयटम गर्ल का खिताब हथियाना है। रीना जहाँ अच्छी डांसर है, वहीँ अच्छी अदाकारा भी है।बहरहाल सीमा के डांस के दीवानों को अब उसकी छोटी बहन का डांस भी जल्द ही परदे पर देखने को मिलेगा।
निरहू के लव स्टोरी
आपको लग रहा होगा की भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ की कोई लव स्टोरी की जानकारी मिल रही है। लेकिन ऐसा है नही, यहाँ हम निरहुआ की नही बल्कि बिरेन्द्र चौहान निरहू की बात कर रहे हैं। निरहुआ की तरह निरहू भी उत्तरप्रदेश के रहने वाले हैं और उनकी ही तरह गायक हैं। निरहू की माने तो दोनों ने ही गायकी की शुरुवात साथ-साथ की थी, लेकिन किस्मत ने निरहुआ का साथ दिया और वे भोजपुरी के हॉट केक बन गए । इधर निरहू ने भी अब बतौर अभिनेता भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में कदम रख दिया है। निरहू के पहले अल्बम निरहू के लव स्टोरी ने उत्तर प्रदेश में काफ़ी धूम मचाई थी। शायद यही वजह है की निरहू की पहली फ़िल्म का नाम भी निरहू के लव स्टोरी थी। आपको जानकर आश्चर्य होगा की इस फ़िल्म ने वाराणसी और आसपास के इलाके में भोजपुरी के आज के सुपर स्टारों की फिल्मो की तुलना में कई गुना अधिक व्यवसाय किया। अपनी पहली फ़िल्म की सफलता से उत्साहित निरहू कहते हैं मैं ठेठ ग्रामीण हूँ इसीलिए मेरे सारे अल्बम जैसे निरहू कसबतिया , आए हो निरहू, निरहू एक्सप्रेस , निरहू जेंटलमेन आदि ने गांवों में धूम मचाई है और गाँव में होने वाले कार्यकर्मो में मेरी जबरदस्त मांग है। लगभग १०० अल्बम में गा चुके निरहू के लव स्टोरी आगामी ७ अगस्त को मुंबई में प्रर्दशित होगी ।
सोमवार, जुलाई 13, 2009
बिरहा सम्राट विजय लाल की बियाह

बिरहा गायकी में अपना सिक्का जमा चुके विजय लाल यादव ने भी अभिनय के क्षेत्र में कदम रखते हुए कई फिल्मो में काम कियाहै, लेकिन बतौर मुख्य अभिनेता उनकी पहली फ़िल्म बियाह - द फूल इंटरटेनमेंट इसी शुक्रवार मुंबई में रिलीज़ हो रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश में अच्छा कारोबार कर चुकी इस फ़िल्म का निर्माण माडर्न म्यूजिक कंपनी के बैनर तले निर्माता अरिमर्दन सिंह व निर्देशक विजेंद्र आकांक्षा ने किया है। बियाह द फूल इंटरटेनमेंट गाँव में शादी वियाह में अड़ंगा लगाने वालो की कहानी पर आधारित है। फ़िल्म में विजय लाल यादव का साथ दे रही है लवी रोहतगी। फ़िल्म के अन्य कलाकारों में प्रसिद्द गीतकार बिपिन बहार , लोकगायक आनंद मोहन, दिवाकर द्वेवेदी , गौतम तूफ़ान, लूदडू दीवाना और सोनू सिंह सुरीला आदि हैं। फ़िल्म में लोक गायकों की भरमार है। दिवाकर द्वेवेदी उत्तर प्रदेश के प्रसिद्द लोक गायक माने जाते हैं। ढेर सारे गायकों को फ़िल्म में शामिल करने के सम्बन्ध में अरिमर्दन सिंह का कहना है की हर गायकों का अपना एक श्रोता वर्ग है, और बिहार यु.पी.में फ़िल्म हिट कराने में इन गायकों का भी अपना एक अहम् योगदान है। विजय लाल यादव के अनुसार इस फ़िल्म से उन्हें दर्शको का काफी प्यार मिला है। बहरहाल विजय लाल यादव को पुरा भरोसा है की उनकी फ़िल्म को मुंबई में भी अच्छा व्यवसाय मिलेगा ।
रविवार, जुलाई 12, 2009
बूगी बूगी में भोजपुरिया महानायक रविकिशन

सोनी टीवी के चर्चित शो बूगी-बूगी भोजपुरिया महानायक रविकिशन के जन्म दिन पर रविकिशन के प्रसंशको को खास तोहफा दे रहा है। आगामी १७ जुलाई को रविकिशन के जन्मदिन के अवसर पर प्रसारित होने वाले एपिसोड में रविकिशन अतिथि जज की भूमिका में तो होंगे ही साथ ही वो अपनी बहुप्रतिक्षित फ़िल्म लक के गाने पर परफोर्म भी करेंगे। इतना ही नही रविकिशन इस शो में भी अपना भोजपुरिया अंदाज़ बिखेरने वाले हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार सोनी टीवी के बूगी बूगी में इन दिनों मम्मी स्पेशल डांस प्रतियोगिता चल रहा है। बिहार - उत्तरप्रदेश में खासे लोकप्रिय और अष्टविनायक सिने विजन की सोहम शाह निर्देशित फ़िल्म लक में अहम किरदार निभा रहे रविकिशन इस शो में बतौर अतिथि आमंत्रित हुए हैं। हाल ही में इसकी शूटिंग संपन्न हुई है। शो में रविकिशन ने लक के गाने - आजमाले लक .....पर परफोर्म भी किया। साथ ही दर्शको की मांग पर उन्होंने एक भोजपुरी का गाना भ गया । बूगी बूगी में ये एपिसोड रविकिशन के जन्मदिन १७ जुलाई को प्रसारित किया जाएगा।
शनिवार, जुलाई 11, 2009
लक से मेरी दूसरी पारी शुरू हो रही है- रवि किशन

लक में आपका किरदार अन्य अभिनेताओ से किस तरह अलग है ?
सबसे पहले तो मैं आपको बता दूँ , लक कुछ लकी लोगो की कहानी है। उनमे से मैं भी एक हूँ। जहाँ तक मेरे किरदार की बात है - मैं एक मनोरोगी की भूमिका में हूँ, जिसका नाम राघव है। राघव इतना लकी है की मौत उसका कुछ भी नही बिगाड़ सकती है। लक में लोगो की मौत पर जुआ लगता है और सबसे अधिक जुआ मुझ पर ही लगाया जाता है। मुझ पर फिल्माए गए दृश्य भी लाजवाब हैं। मुझे खुशी है की सोहम ने मुझ पर भरोसा किया और मेरे किरदार को नई दिशा मिली ।
किस तरह के दृश्य हैं लक में?
लक के हर दृश्य अन्य हिन्दी फिल्मो से बिल्कुल अलग हैं, जिसे देखकर दर्शक काफी रोमांचित होंगे। खाई में कूदना, हेलिकोप्टर से हजारो फिट की ऊंचाई से कूदना, समंदर में शार्क मछलियों के बीच गोता लगना, चलती ट्रेन के उपर जबरदस्त फाइट , ट्रेन के सामने छलांग लगाना जैसे कुछ दृश्य इस फ़िल्म को अन्य फिल्मो से अलग करता है। मेरे लगभग बीस साल के फिल्मी सफर में ऐसे दृश्यों से मेरा सामना पहली बार हुआ है।
कैसा अनुभव रहा ?
मौत को सामने देखने का अनुभव काफी भयावह होता है। हलाँकि सुरक्षा व्यवस्था काफी थी लेकिन दो बार मुझे ऐसा लगा की अब मौत निश्चित है। पहली बार जब मैं समंदर में शार्क मछलियों के बीच था। दरअसल सोहम ने सभी को स्कुआ डाइविंग की अच्छी ट्रेनिंग दी थी, लेकिन उस दौरान मैं तीन दिनों के लिए मुंबई आ गया था, इसीलिए मुझे उस बारे में खास जानकारी नही थी। शूटिंग के दिन ही थोडी बहुत जानकारी दी गई और जब आक्सीजन का मास्क पहन जब मैं पानी में उतरा तब मुझे अंदाजा हुआ की मेरे साथ एक दो नही कई शार्क मछलियां हैं। सच पूछिए तो मुझे लगा मेरी मौत निश्चित है। एक पल में मुझे मेरे सारे अपने याद आ गए। दूसरी बार जब मेरे और इमरान के बीच ट्रेन के उपर फाइट सीन फिल्माया जा रहा था तब मैं चलती ट्रेन से गिरते गिरते बचा था। हलाँकि बचने के क्रम में मुझे काफ़ी चोटें आई लेकिन हमने कुशलता पूर्वक शूटिंग पूरी की ।
आपके सह कलाकार का रवैया आपके साथ कैसा था ?
बहुत ही अच्छा ... मिथुन दा, संजू बाबा और डैनी सर से तो मेरी पुरानी पहचान थी। इमरान और श्रुति से मेरी मुलाकात सेट पर ही हुई। श्रुति के तो खून में ही अभिनय है और वो बिल्कुल सहजता से सारे दृश्य को अंजाम देती है। उसका व्यवहार भी काफी अच्छा रहा। फ़िल्म में उसके साथ मेरे कई दृश्य हैं। अगर आपके सन्दर्भ में लक को देखा जाए तो एक शब्द में आप क्या कहेंगे ?
दिल से कहूँ तो लक से मेरी हिन्दी इंडस्ट्रीज में मेरी वापसी हो रही है। रिलीज़ के पूर्व ही सिर्फ़ प्रोमो देखकर ही मुझे कई बड़ी फिल्मो के ऑफ़र आ रहे हैं। दो नई फिल्में मैंने साइन भी की है लेकिन उसके बारे में मैं चर्चा फिलहाल नही करूंगा। लक के बाद मणि सर की रावण और श्याम बेनेगल सर की वेल्डन अब्बाजी सारी कसर पूरी कर देगी।
आप हिन्दी फिल्मो में व्यस्त हैं तो क्या भोजपुरी फिल्में नही करेंगे ?
भोजपुरी फिल्में नही करने का तो सवाल ही नही उठता है। भोजपुरी फिल्मो के कारण ही आज हिन्दी फिल्मो का द्वार मेरे लिए खुला है । वैसे भी भोजपुरी मेरी मातृभाषा है और मुझे भोजपुरी फिल्मो में काम करना पसंद है। जहाँ तक हिन्दी फिल्मो में व्यस्तता की बात है तो मैं भोजपुरी में अपनी फिल्मो की संख्या थोडी कम कर रहा हूँ। प्रस्तुति- उदय भगत
गुरुवार, जुलाई 09, 2009
इनफिनिटी इंटरटेनमेंट की प्रोडक्शन नंबर वन
भोजपुरी फ़िल्म जगत के प्रसिद्द कैमरामेन शाद कुमार अब निर्देशन की ओर भी कदम बढ़ा दिया है. बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म का मुहूर्त हाल ही में सन्नी सुपर साउंड स्टूडियो में संपन्न हुआ । इनफिनिटी इंटरटेनमेंट के बैनर तले बन रही इस फ़िल्म के निर्माता पी.मिश्रा व सह निर्माता बी.अली हैं। मुहूर्त के अवसर पर अभिनेता राकेश पांडे, विजय लाल यादव, अभिनेत्री पूनम सागर, सीमा पांडे, उदय श्रीवास्तव, विलास उजावने, चंदू धनवानी, अमृत पाल सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। संतोष मिश्र द्वारा लिखित इस फ़िल्म के संगीतकार अशोक कुमार दीप, गीतकार अशोक कुमार दीप और राम विनोद पासवान हैं। शाद कुमार के अनुसार इस अनाम फ़िल्म में विनय आनंद, विराज भट्ट, धर्मेश कुमार, पूनम सागर, विजय लाल यादव, उदय श्रीवास्तव, देव मल्होत्रा, पियूष चक्रवर्ती, और राकेश पांडे मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। फ़िल्म की शूटिंग जल्द ही शुरू होगी।
